आज मुझे काफी गालियां पड़ी हैं, वाट्स पर कुछ भाईयों ने पर्सनल मैसेज भेज कर कहा है ज्यादा दिमाग आ गया है, देशद्रोहियों का विडियो शेयर कर रहे हो, कुछ लोगों ने फेसबुक के मैसेज बाॅक्स में गंदी गंदी गालियां टाईप करके अपनी राष्ट्रभक्ति का परिचय दिया है। मेरा भाईयों से अनुरोध है कि वे लगातार मेरे फेसबुक वाॅल को पढ़ते रहे, उसे देखते रहे मैं हमेशा लिखता रहूंगा और जो मुझे अच्छा लगेगा वह पोस्ट करता रहूंगा। आज मैंने जेएनयू स्टूण्डेंट यूनियन की वाईस प्रेसिडेंट शहला रसीद का 14 फरवरी को दिया गया व्यक्तव्य और उमर खालिद द्वारा जेएनयू पहुंचने के बाद दिये गये भाषण के विडियों, कई विचारकों के लेख पोस्ट किये हैं। मैं मानता हूं कि मेरे बहुत से राष्ट्रभक्त भाईयों को मेरा यह कृत्य पसंद नहीं आया। अब इन सब से पुछना चाहूंगा कि इन दोनों विडियो और उन लेखों में गलत क्या है:-
मेरा सवाल है इस देश के उस सिस्टम से जिससे आज का अधिकांश युवा वर्ग खफा है, मैं ना तो दिल्ली की बात करना चाहूंगा और ना ही मुम्बई की, मैं सरगुजा का रहने वाला हूं यहीं की मेरी पैदाईश और मैं यहीं के सवालों को उठाना चाहूंगा कि आखिर क्यों हमें आज़ादी चाहिए। आप कहते हैं हमारा लोकतंत्र कहता है कि जनता के लिये जनता के द्वारा जनता का शासन है। कहां है मुझे दिखाई नहीं दे रही है।
आप कहते हैं क्यों किस बात की आज़ादी मांग रहे हो, अरे भाई! इसी सरगुजा की मिट्टी में पैदा लिये मेरे कुछ ऐसे भाई भी हैं, जिनके पुरखों की जमीनों को सरकार ने लाखों-करोड़ों में सरकारी व प्राइवेट कोल कंपनियों को दे दिया गया है। जमीन जाने के बाद उन भाईयों की जिंदगी ऐसी हो गई है जैसे भिखमंगों की हालत। सरकार कहती है हमने उचित मुआवजा दिलाया, ये उसे नहीं रख सके, उसे नहीं पचा सके तो हमारी गलती क्या है? सरकार आपकी गलती यह है कि आपने कभी शिक्षा को शिक्षा के रूप में लिया ही नहीं वर्षों से चली आ रही शिक्षा व्यवस्था का आधार यह है कि ग्रामीण व्यक्ति केवल हस्ताक्षर करना सिख जाये वहीं साक्षरता दर बढ़ाने का आधार है और शिक्षा को मजबूती देने का सबसे बड़ा शस्त्र। इस हस्ताक्षर वाले आदमी को मैं निरक्षर की लिस्ट में रखता हूं, जिसे कुछ नहीं आता और सरकार जनसुनवाई के नाम पर संगीनों के साये में इनसे इनकी जमीन हथिया लेती है। जमीन देने वाला सड़क पर आ जाता है, गाय और बैल के साथ जिंदगी बिताता है, करोड़ों कमाती है एसईसीएल, करोड़ों अरबों कमाता है अदानी और सरगुजा की कमाई से रायपुर का विकास होता है, सरगुजा के हाथ क्या आता है। सरगुजा को केवल मिलती है लाचारी, भूखमरी और फिर उससे भी पेट नहीं भरता तो रोज कोल परिवहन करने वाले ट्रालों के निचे पिसती हैं कई जिंदगींया। भाई मुझे इस जनसुनवाई से आज़ादी चाहीए जहां प्रशासनीक गुण्डा गर्दी द्वारा संगीन के साये में कोल खदानों के लिये, बाक्साईड के लिये सहमती दिलायी जाती है। मुआवजा के नाम पर, नौकरी के नाम पर वर्षों से गरीब, किसान लोग आॅफिसों के चक्कर काट-काट कर मर रहे हैं, लेकिन उनकी सुनने वाला ना तो जनप्रतिनिधि है और ना ही प्रशासन केवल एक दूसरे के साथ ये लेटर भेज भेज कर लव लेटर वाली खेल खेल रहे हैं।
भाईयांे हमें आज़ादी चाहिए उस व्यवस्था से जहां सरगुजा संभाग का ही चुनचुना और पुदंाग का क्षेत्र आता है, जहां का विकास ठहरा हुआ है, उन ग्रामीणों का क्या दोष है जिसे नक्सली और पुलिस दोनों बजा जाते हैं, वे किसकी सुने नक्सलियों की सुने तो पुलिस मीना खलखो बता कर मार देगी, सोनी सोरी सा सीतम करेगी उनके गुप्तांगों में कंकड़ पत्थर ठूंस देगी, पुलिस की सुने तो वे जो अपने आप को गरीबों का मसीहा बताते हैं लेकिन वे भी अब केवल अपना पेट भरने तक सीमित हैं, गला काट कर चले जाते हैं, 6 इंच छोटा करने की धमकी देते हैं।
भाईयों आज़ादी चाहिए उस व्यवस्था से जहां इस जिले के मुलनिवासियों के सर छुपाने के लिये दो गज जमीन और सर के ऊपर छत नहीं है। निकालिये पिछले कुछ रिकाॅर्डों को देखिये पिछले कुछ समय से सरगुजा, सूरजपुर और बलरामपुर के कलेक्टर जनदर्शन में अधिकतर आदिवासियों ने वन अधिकार पट्टा और समुदाय आधारित पट्टा की मांग की है और उन आवेदनांे पर कार्यवाही करना छोड़, तहसीलदारों ने इन आवेदकों को जमीन कब्जा करने के विरूद्ध दण्ड स्वरूप 5000 से 10000 तक जुर्माना लगा दिया है और बसे बसाये घर को उखाड़ फेंका है, पुराने रिकाॅडों में वह जमीन छोटे झाड़ की जंगल है, साफ दिखाई दे रही है, लेकिन कुछ ज्यादा पढ़ कर आये, हमारे कुछ अधिकारियों ने उसे गौशाला बनाने और गोचर भूमि बता कर कई गरीब लाचार आदिवासियों के आशियाने को बुलडोजर चलाकर ध्वस्त कर दिया है। जब जनता के लिये जनता के द्वारा जनता का शासन है तो फिर ऐसा क्यों हो रहा है। इसी व्यवस्था से आजा़दी चाहिए।
भाईयों मुझे उस व्यवस्था से आज़ादी चाहिए जहां पर सरकारी नौकरी में 30-35 साल देने के बाद जब कोई शासकीय कर्मचारी रिटायर होता है, तो तुरंत ही उसके समस्त मिलने वाले राशियों का भुगतान कर देना चाहिए, जिसने 30-35 साल खुन पशीना एक कर सरकारी कार्य के लिये दिया है, उसके इनक्रिमेंट की राशि, अर्जित अवकाश की राशि अन्य स्वत्व की भुगतान हेतु उसे वर्षों से घुमाया जा रहा है और वह अकेला नहीं ऐसे लोगों की संख्या दर्जनों में है। जो कुछ कर पायें कृपया भैयाथान ब्लाॅक शिक्षा अधिकारी के कार्यालय में पता करें, एक चपरासी की रिटायरमेंट के बाद बिमारी की वजह से मृत्यु हो गई आज मृत्यु के एक से डेढ़ वर्ष हो गये लेकिन आज तक उसे इन राशियों का भुगतान नहीं हुआ। अभी भी दर्जनों शिक्षक इसके 6 महिने, साल भर से प्रयास कर रहे हैं, लेकिन उनके इन राशियों का भुगतान नहीं हो रहा है, स्वयं कलेक्टर और संभाग आयुक्त ने इसके लिये पत्र लिखा है, लेकिन ब्लाॅक शिक्षा अधिकारी मामले को तरजीह नहीं दे रहे तो सिर्फ इसलिये क्यों कि उन्हें 10 प्रतिशत चंदा चाहिए। भाईयों मुझे इस व्यवस्था से भी आज़ादी चाहिए। मुझे इस व्यवस्था से आज़ादी चाहिए जहां अपने पसीने की कमाई लेने के लिये भी रिश्वत देनी पड़े।
भाईयों मुझे आज़ादी चाहिए अपने भविष्य को बनाने के लिये सरगुजा ही नहीं छत्तीसगढ़ में सरकार ने कई विश्वविद्यालयों की स्थापना कर दी है, किन्तु उन्हें सुविधा सम्पन्न नहीं बनाया विश्वविद्यालयों का एक दशक एकाध-दो साल में पुरा हो जायेगा। प्रत्येक साल विश्वविद्यालय के लापरवाही के कारण देर से परीक्षा परिणाम निकालने, सही काॅपी नहीं जांचने के कारण कई छात्रों एक-एक साल बर्बाद हो रहा, इसकी जवाबदारी कौन लेगा, वर्षों से विभिन्न छात्र संगठन इसके लिये आवाज़ उठा रहे हैं, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं है, जब कोई गुस्से में गलत बोल दे तो, विश्वविद्यालय के कर्मचारी हड़ताल पर बैठ जाते हैं, लेकिन छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ करने वालों के ऊपर एक केस तक दर्ज नहीं होती क्यों ? क्यों मिडिया, जनप्रतिनिधी और वे लोग जो आज़ादी मांगने को गलत कहते हैं, वे सरकार को इसके लिये मजबूर नहीं कर पाते कि वह शिक्षा की व्यवस्था को सुधारे। आप कहते हैं सभी विश्वविद्यालयों में भारतीय तिरंगा झण्डा लहरायेंगे, भाईयों यह देश के शान का प्रतिक है लहराना चाहिए, किन्तु इसके लिये इतना प्रपंच क्यों कि इतने फिट का होगा और ऐसा होगा, जितना पैसा आप तिरंगा झण्डा लहराने में पुरे देश में खर्च करेंगे, उतने में हमारे राज्य के कई विश्वविद्यालयांे की स्थिति सुधर जायेगी, आप शिक्षा की व्यवस्था को तो सुधारिये, झण्डा खम्भे में नहीं हर दिल में फहरेगा। भाईयों मुझे इस व्यवस्था से आज़ादी चाहिए, जहां सरकार गुंगी और बहरी हो।
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